Sunday, May 20, 2012



सोचता हूँ क्या दे पाउँगा जो मैंने पाया है इस देश से.
क्या मैं कभी चुका पाउँगा जो मैंने पाया है इस देश से ||.
फेलाना है मुझे देश सम्मान की भावना.
शायद इस तरह नज़र मिला पाऊं इस देश से ||.

खोया है हर नागरीक जाने किस होड़ मैं.
दिलाना है याद उसे इस देश की ||.
मौका है गडतंत्र दिवस.
मिल के सुंदरता बढ़ाना है इस देश की ||.


........JAI HIND..........
 
We Are Not Human Beings
Having a Spiritual Experience.
We Are Spiritual Beings
Having a Human Experience.

........JAI HIND..........

 Waves are always our Inspiration, 
not because they look beautiful 
but because whenever they go down 
they come up with a greater speed.

........JAI HIND..........


 !! सुलझता फितूर.........@


आसमां का बरसना अभी बाक़ी है...
ज़मीं का उगना बाक़ी है...

बाक़ी है कहानी में कहानी की कहानी...
बात की बात करनी बाक़ी है...

क्या-क्या गुज़र चुका है अब तलक़....
क़तार में खड़ा बाक़ी अभी बाक़ी है...

वक़्त के कठघरे में वक़्त की पेशी बाक़ी है ...
और ख़त्म होने से पहले

अंजाम भी अपना अंजाम देखना चाहता है...
ये ख्वाहिशों की ख्वाहिशें कभी पूरी हो सकेंगी...

या रह जाएगी बाक़ी दास्तां हर कहानी की...


........JAI HIND..........

 !......गाँवों का रोना, दिल्ली को गाना लगता है.....!


चिड़िया की जाँ लेने में इक दाना लगता है
पालन कर के देखो एक जमाना लगता है ॥१॥

अंधों की सरकार बनी तो उनका राजा भी
आँखों वाला होकर सबको काना लगता है ॥२॥

जय-जय के नारों ने अब तक कर्म किये ऐसे
हर जयकारा अब ईश्वर पर ताना लगता है ॥३॥

कुछ भी पूछो, इक सा बतलाते सब नाम-पता
तेरा कूचा मुझको पागलखाना लगता है ॥४॥

दूर बजें जो ढोल सभी को लगते हैं अच्छे
गाँवों का रोना, दिल्ली को गाना लगता है ॥५॥

कल तक झोपड़ियों के दीप बुझाने का मुजरिम
सत्ता पाने पर, अब वो परवाना लगता है ॥६॥

टूटेंगें विश्वास, कली से मत पूछो कैसा
यौवन देवों को देकर मुरझाना लगता है ॥७॥

जाँच समितियों से करवाकर कुछ ना पाओगे
उसके घर में शाम-सबेरे थाना लगता है॥८॥

(हमारे नेताओं की लीलाओं को समर्पित ....



........JAI HIND..........




 तुम को देखा जैसे दरपन देख रहा हूँ .
कहीं छिपा तुम में अपना मन देख रहा हूँ.
नैन नासिका अधर कर्ण सुंदर सी ग्रीवा ,
एक सपन का भूमि अवतरन देख रहा हूँ.
कविता का सौन्दर्य तुम्ही से आया मुझ में,
फिर बरसे यह बादल, गर्जन देख रहा हूँ.
सूत्रपात हो तुम मधुरिम साहित्य निधि का,
रूप तुम्हारे में अनुपम धन देख रहा हूँ.
चाहूँ- प्यार करूँ -दिल में रखूं या गाऊं,
क्यूँ है तुम से यह आकर्षण देख रहा हूँ.
मधुर तुम्हारे सपने नैन चुराते आते ,
खुली आँख से वह आलिंगन देख रहा हूँ.

जय माँ भारती



........JAI HIND..........