Tuesday, May 29, 2012


 आस्तीं धो रहा है सन्नाटादुश्मनी दिल की पुरानी चल रही है जान से .......
लडते लडते ज़िन्दगी गुजरी है बे ईमान से .....

ऐ वतन एक रोज तेरी ख़ाक में खो जायेगे ,सो जायेगे
मर के रिश्ता नहीं टूटेगा हिन्दुस्तान से ...ईमान से...


........JAI HIND..........

 सिर्फ झूठ की पैठ सदन में सच के लिए मनाही है
चोर वहाँ का राजा है
सहयोगी जहाँ सिपाही है ।
जो कपास की खेती करता उसके पास लँगोटी है
उतना महँगा ज़हर नहीं है जितनी महँगी रोटी है
लाखों टन सड़ता अनाज है
किसकी लापरवाही है ।
चारों ओर तबाही भइया
चारों ओर तबाही है ।

........JAI HIND..........

हमसफ़र सो रहा है सन्नाटा
दास्ताँ हो रहा है सन्नाटा

कोई दस्तक न कोई आहट है
चैन से सो रहा है सन्नाटा

कैसे रंगीनियों में डूबीं रात
खुसबुए बो रहा है सन्नाटा

दूधिया चांदनी को ओढ़े हुए
बेखबर सो रहा है सन्नाटा

क़त्ल करके तमाम आवाज़ें
आस्तीं धो रहा है सन्नाटा


........JAI HIND..........




हिंदू धर्म, विश्व का सबसे प्राचीन धर्म, जो कब
और कैसे शुरू हुआ किसी को नहीं पता. ये
अनादि काल से चला आ रहा है. ये विश्व
का एकमात्र ऐसा धर्म है जो किसी एक
व्यक्ति ने नहीं बनाया. विश्व केसभी धर्मो के
बारे में प्रमाण उपलब्ध हैं की किस धर्म को किस
व्यक्ति ने बनाया|
हिंदू धर्म के बारे में जो सबसे पुराना प्रमाण
उपलब्ध है उसके अनुसार "इन्दुस"नदी (वर्तमान
में सिंधु जो की पाकिस्तान में है) की घाटी में
रहने वाले लोगों को हिंदू कहा गया। इससे
पुराना प्रमाण किसी धर्म के बारे में प्राप्त
नहीं हुआ है. ऋग वेद, हिंदू धर्म का सबसे प्राचीन
वेद। अगर इसको विश्व की सबसे पुरानी किताब
कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी.ज्योतिष
शास्त्र, आकाश के ग्रहों, नक्षत्रों और
तारामंडलों के अध्यन की कला समूचे विश्व
को हिंदू धर्म से ही मिली.विक्रमी संवत,
दुनिया को दिन, महीने और साल
की जानकारी देने वाला पहला पंचांग
(calendar) हिन्दुओं ने ही बनाया।
बौद्ध धर्म के संस्थापक गौतम बुद्ध हिंदू थे।
जैन धर्म के संस्थापक महावीर जैन भी हिंदू थे।
सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव भी हिंदू
ही थे।
उपरोक्त तो बस कुछ ही बिन्दु हैं। हिंदू धर्म
कितना महान है ये किसी की कल्पनाके भी परे
है। इतने महान धर्म पर सदियों सेप्रहार होते
आए हैं इसको नष्ट करने के लिए। मुसलमानों ने सन्
712 में सिंध का छेत्र जीत कर वहाँ अपने इस्लाम
धर्म की नींव रखी और सन् 875 तक सिंधु नदी के
छेत्र में उन्होंने अपना पूर्ण रूप से अधिकार कर
लिया। सन् 1017 में मुहम्मद गजनी ने मथुरा और
गोकुल को लूटा और वहाँ एक मस्जिदबनाईं।
सन् 1024 में मुहम्मद गजनी ने सोमनाथ के
मन्दिर पर आक्रमण कर मन्दिर को नष्ट करा।
वहाँ शिवलिंग को खंडित कर दिया और करीब
50,000 से ज्यादा हिन्दुओ का कत्ल किया।
वहाँ भी उसने एक मस्जिद बनाईं। सोमनाथ के
मन्दिर पर उसने इस प्रकार से 17 बार आक्रमण
करा। सन् 1197 में मुस्लिम इख्तियार उददीन ने
नालंदा विश्वविध्यालय (बिहार में) को नष्ट
किया जो उस समय का विश्व का सर्वश्रेष्ठ
विश्वविद्यालय था। सन् 1528 में बाबर ने
अयोध्या का राम मन्दिर तोड़ कर
वहाँ बाबरी मस्जिद बनाईं। सन् 1658 में
औरंगजेब ने जबरन हिन्दुओं को इस्लाम कबूल करने
पर मजबूर करा। जिन्होंने इस्लामकबूल
नहीं करा उन पर ज़ुल्म किए गए और मार
दिया गया। सन् 1688 में औरंगजेब ने मथुरा और
आस पास के करीब 1000 मन्दिर तुड़वा दिए।
मुगलों के कुल शासनकाल में करीब 60,000
मन्दिर तोडे गए। सन् 1761 में अहमद शाह
दुर्रानी ने उत्तर भारत में 2,00,000 हिन्दुओं
को मौत के घाट उतार दिया।
इसके बाद हिन्दुस्तान पर अंग्रेजो का आधिपत्य
हो गया और फिर उन्होंने अपने इसाई धर्म
को बढावा दिया। अंग्रेजों के अत्याचार
की कहानी तो जलियाँ वाला बाग़ सुनाता है।
इस प्रकार से हमारी हिंदू सभ्यता और
संस्कृति को कई बार पैरों तले रौंदा गया।
कभी मुसलमानों ने और कभी इसाईओं ने. बहुत सह
चुके हम और बहुत सह चुका हिंदू धर्म। अब हम और
नहीं सहेंगे।
"त्रेता युग और द्वापर युग की तरह इस युग में
भी भगवान धर्म की रक्षा के लिए और अधर्म के
विनाश के लिए धरती पर अवतार लेंगे." ऐसा सोच
कर हम कब तक भगवान के अवतरण
की प्रतीक्षा करेंगे? और वैसे भी कहा गया है
की "जो अपनी सहायता स्वयं करते हैं, भगवान
भी उन्हीं की सहायता करते हैं।" इसीलिए
भगवान से सहायता लेने के लिए पहले हमें स्वयं
ही कदम उठाना होगा, शंखनाद
करना होगा दुनिया को बताने के लिए कि हिंदू
धर्म में दया और करुणा तभी तक दिखाई जाती है
जब तक पापी अपनी सीमा में रहे।
तो आइये, हिंदू धर्म की रक्षा और उत्थान के लिए
हम सभी एकजुट होकर आह्वान करते हैं।





........JAI HIND..........

Monday, May 28, 2012


माँ जैसी दौलत दुनिया में नही है,
माँ जिसके है पास वह सबसे धनी है।

माँ तो है अनमोल न कीमत लगाना
रखना ख्याल उसका ,न उसको रुलाना,
माँ के रुदन से ही हिलती ज़मीं है।
माँ जिसके है पास वह सबसे धनी है॥

माँ गर न होती यह दुनिया न होती
न आकाश होता ,ज़मीं भी न होती,
माँ के जतन से ही सृष्टि पली है ।
माँ जिसके है पास वह सबसे धनी है॥


 ........JAI HIND..........


: आसू को तेज़ाब बना लो ::
:: इस दिल को फोलाद बना लो ::
:: हाथो को हथियार बना लो ::
:: बुद्धि को तलवार बना लो ::
:: फिर मेरे संग कदम मिलाकर ::
:: प्राणों में तुम आग लगाकर ::
:: ललकारो उन मक्कारों को ::
:: भारत माँ के गदारो को ::

 ........JAI HIND..........

अब वक़्त आ गया है अपना मौन तोडिये,
घर से बाहर निकले, ये रोना पीटना छोडिये,
आपके अनकूल न होगा कभी रुख हवा का,
बेहतर होगा की आप तूफां का रुख मोड़िये.

........JAI HIND..........
बेड़ा देश का गर्क हो गया ,
प्रधान जी आपका शासन भी नर्क हो गया ,
रहे होंगे कभी आप ईमानदार ,
लुच्चों से अब आपका भी संपर्क हो गया .

Saturday, May 26, 2012

  National flag was Burnt in J&K.
कश्मीर जो खुद सूरज के बेटे की रजधानी था
डमरू वाले शिव शंकर की जो घाटी कल्याणी था

कश्मीर जो इस धरती का स्वर्ग बताया जाता था
जिस मिट्टी को दुनिया भर में अर्ध्य चढ़ाया जाता था

कश्मीर जो भारतमाता की आँखों का तारा था
काश्मीर जो लालबहादुर को प्राणों से प्यारा था

काश्मीर वो डूब गया है अंधी-गहरी खाईमें
फूलों की खुशबू रोती है मरघट की तन्हाई में

ये अग्नीगंधा मौसम की बेला है
गंधों के घर बंदूकों का मेला है

मैं भारत की जनता का संबोधन हूँ
आँसू के अधिकारों का उदबोधन हूँ

मैं अभिधा की परम्परा का चारण हूँ
आजादी की पीड़ा का उच्चारण हूँ

इसीलिए दरबारों को दर्पण दिखलाने निकला हूँ |
मैं घायल घाटी के दिल की धड़कन गाने निकला हूँ ||

बस नारों में गाते रहियेगा कश्मीर हमारा है
छू कर तो देखो हिम छोटी के नीचे अंगारा है

दिल्ली अपना चेहरा देखे धूल हटाकर दर्पण की
दरबारों की तस्वीरें भी हैं बेशर्म समर्पण की

काश्मीर है जहाँ तमंचे हैं केसर की क्यारी में
काश्मीर है जहाँ रुदन है बच्चों की किलकारी में

काश्मीर है जहाँ तिरंगे झण्डे फाड़े जाते हैं
सैंतालिस के बंटवारे के घाव उघाड़े जाते हैं

काश्मीर है जहाँ हौसलों के दिल तोड़ेजाते हैं
खुदगर्जी में जेलों से हत्यारे छोड़े जाते हैं

अपहरणों की रोज कहानी होती है
धरती मैया पानी-पानी होती है

झेलम की लहरें भी आँसू लगती हैं
गजलों की बहरें भी आँसू लगती हैं

मैं आँखों के पानी को अंगार बनाने निकला हूँ |
मैं घायल घाटी के दिल की धड़कन गाने निकला हूँ ||

काश्मीर है जहाँ गर्द में चन्दा-सूरज- तारें हैं
झरनों का पानी रक्तिम है झीलों में अंगारे हैं

काश्मीर है जहाँ फिजाएँ घायल दिखती रहती हैं
जहाँ राशिफल घाटी का संगीने लिखती रहती हैं

काश्मीर है जहाँ विदेशी समीकरण गहराते हैं
गैरों के झण्डे भारत की धरती पर लहरातें हैं

काश्मीर है जहाँ देश के दिल की धड़कन रोती है
संविधान की जहाँ तीन सौ सत्तर अड़चन होती है

काश्मीर है जहाँ दरिंदों की मनमानी चलती है
घर-घर में ए. के. छप्पन की राम कहानी चलती है

काश्मीर है जहाँ हमारा राष्ट्रगान शर्मिंदा है
भारत माँ को गाली देकर भी खलनायक जिन्दा है

काश्मीर है जहाँ देश का शीश झुकाया जाता है
मस्जिद में गद्दारों को खाना भिजवाया जाता है

गूंगा-बहरापन ओढ़े सिंहासन है
लूले - लंगड़े संकल्पों का शासन है

फूलों का आँगन लाशों की मंडी है
अनुशासन का पूरा दौर शिखंडी है

मै इस कोढ़ी कायरता की लाश उठाने निकला हूँ |
मैं घायल घाटी के दिल की धड़कन गाने निकला हूँ ||

हम दो आँसू नहीं गिरा पाते अनहोनी घटना पर
पल दो पल चर्चा होती है बहुत बड़ी दुर्घटना पर

राजमहल को शर्म नहीं है घायल होती थाती पर
भारत मुर्दाबाद लिखा है श्रीनगर की छाती पर

मन करता है फूल चढ़ा दूं लोकतंत्र की अर्थी पर
भारत के बेटे निर्वासित हैं अपनी ही धरती पर

वे घाटी से खेल रहे हैं गैरों के बलबूते पर
जिनकी नाक टिकी रहती है पाकिस्तानी जूतों पर

काश्मीर को बँटवारे का धंधा बना रहे हैं वो
जुगनू को बैसाखी देकर चन्दा बना रहे हैं वो

फिर भी खून-सने हाथों को न्योता है दरबारों का
जैसे सूरज की किरणों पर कर्जा हो अँधियारों का

कुर्सी भूखी है नोटों के थैलों की
कुलवंती दासी हो गई रखैलों की

घाटी आँगन हो गई ख़ूनी खेलों की
आज जरुरत है सरदार पटेलों की

मैं घाटी के आँसू का संत्रास मिटाने निकला हूँ |
मैं घायल घाटी के दिल की धड़कन गाने निकला हूँ ||

जब चौराहों पर हत्यारे महिमा-मंडित होते हों
भारत माँ की मर्यादा के मंदिर खंडित होते हों

जब क्रश भारत के नारे हों गुलमर्गा की गलियों में
शिमला-समझौता जलता हो बंदूकों की नालियों में

अब केवल आवश्यकता है हिम्मत की खुद्दारी की
दिल्ली केवल दो दिन की मोहलत दे दे तैय्यारी की

सेना को आदेश थमा दो घाटी ग़ैर नहीं होगी
जहाँ तिरंगा नहीं मिलेगा उनकी खैर नहीं होगी

जिनको भारत की धरती ना भाती हो
भारत के झंडों से बदबू आती हो

जिन लोगों ने माँ का आँचल फाड़ा हो
दूध भरे सीने में चाकू गाड़ा हो

मैं उनको चौराहों पर फाँसी चढ़वाने निकला हूँ |
मैं घायल घाटी के दिल की धड़कन गाने निकला हूँ ||

अमरनाथ को गाली दी है भीख मिले हथियारों ने
चाँद-सितारे टांक लिये हैं खून लिपि दीवारों ने

इसीलियें नाकाम रही हैं कोशिश सभी उजालों की
क्योंकि ये सब कठपुतली हैं रावलपिंडी वालों की

अंतिम एक चुनौती दे दो सीमा पर पड़ोसी को
गीदड़ कायरता ना समझे सिंहो की ख़ामोशी को

हमको अपने खट्टे-मीठे बोल बदलना आता है
हमको अब भी दुनिया का भूगोल बदलना आता है

दुनिया के सरपंच हमारे थानेदार नहीं लगते
भारत की प्रभुसत्ता के वो ठेकेदार नहीं लगते

तीर अगर हम तनी कमानों वाले अपने छोड़ेंगे
जैसे ढाका तोड़ दिया लौहार-कराची तोड़ेंगे

आँख मिलाओ दुनिया के दादाओं से
क्या डरना अमरीका के आकाओं से

अपने भारत के बाजू बलवान करो
पाँच नहीं सौ एटम बम निर्माण करो

मै भारत को दुनिया का सिरमौर बनाने निकला हूँ मैं घायल घाटी के दिल की धड़कन गाने निकला हूँ........JAI HIND..... कवि=हरिओम जी पँवार

Friday, May 25, 2012


 desh me dhi betiya mayus hai na saadh hai
dil pe rakh ke haath kahiye desh kya azaad hai
kam umer me saadi ki gadi me ye joti gaye
betiyan ban ban ke maayen zindgi khoti gaye
inki halat to abhi tak har tarf barbaad hai
dil pe rakh kar haath kahiye desh kya azaad hai.


........JAI HIND..........


 
नौ महीने तक हम तुझे,
कोख में छुपा के चले ,
दो वर्ष तक तो हम तुझे ,
गोद में उठा के चले ,
डेढ़ से दो वर्ष तो हम तेरी ,
हर अनकही कों भी समझे,
फिर तेरी माँ की बस,
बोली सुन के हर्षे

तेरे पहले कदम पर भी ,
हम ही बच्चे बन के उछले,
तेरे भूख प्यास कों भी समझे,
तेरे हर चाल ढाल कों समझे ,
तेरे हर प्रयत्न कू शाबासी हम दिये,
सीख जायें तु तब तक उत्साहित तुझे किये|
पढ़ना लिखना तुझे सिखायें ,
चलना सही डगर बतायें ,
डगमगायें ना कही तु ,
हम हर समय सहारा बान तेरा रहे ,
और आज तु जब बड़ा हो गया ,
हमें ही तु अपना बोझ कह गया |

बुढ़ापा जब हमारा लगा आने,
तब एक भी दिन तुझे हम भारी लगे लगने ,
पिछला सब कुछ भूल तुने ,
लगा अब दूसरों की है सुनने,
माँ तुझे अब लगी है खलने ,
हम से ही चला अपना पिंड छुड़ाने ,
छोड़ आया तु हमें ही वीरानें |

माँ कहने में भी अब लगी तुझे शर्म आने,
फिर भी मैं तो माँ हूँ तेरी ,
तुझे लग जायें यह दुआ मेरी ,
तेरे बच्चे ना करे यह गत तेरी ,
पलकों पर रक्खे आदर करे सदा तेरी ||










........JAI HIND..........

 
 
 
 
"हार नहीं जीत है ये पावन पुनीत है ये क्रन्तिकारी गीत है महान वन्दे मातरम,
भगत का गुरुग्रंथ बिस्मिल की हे ये गीता अशफाकुल्लाह का कुरान वन्दे मातरम.
जेल की दीवारों पे जो शहीदों ने लहू से लिखी, जंगे आज़ादी की दास्ताँ वन्दे मातरम.
जिसको फिरंगियों की फांसिया न रोक पाई, शुलियो पे गाया गया गन वन्दे मातरम."



........JAI HIND..........

इक गुजारिश है - बस थोड़ा सा रो देना........!!!

जब माँ का "कलेजा" कटकर अलग हो जाए, थोड़ा-सा रो देना !
जब मातृभूमि-रक्षण विफल हो जाए, थोड़ा-सा रो देना !
जब "कश्यप-तपोभूमि" पर तिरंग-भस्म हो जाए, थोड़ा-सा रो देना !
जब "स्व-धरा" पर विदेशी ध्वज-लग्न हो जाए, थोड़ा-सा रो देना !
जब भारत-भूमि का "मुकुट"-पतन हो जाए, थोड़ा-सा रो देना !
जब सन संतालिस (1947) कल हो जाए, थोड़ा-सा रो देना !
जब देह से "प्राणों" का "पृथक्करण" हो जाए, थोड़ा-सा रो देना !
जब पौरुष पर नपुंसकता स्थानापन्न हो जाए, थोड़ा-सा रो देना !

थोड़ा-सा रो देना के ना हम बचा सके, न तुम बचा पाओगे........
थोड़ा-सा रो देना के हम लिखते रह गए, तुम पढ़ते रह जाओगे........



........JAI HIND..........

Thursday, May 24, 2012


 हे माँ मुझे वो शक्ति दे कि फिरसे जाग खड़ा हो जाऊं
भय कोसों मुझसे दूर रहे मैं पाताल चीरकर आ जाऊं
वो गर्जन सा हुंकार भरूँ जिसे सुन सिंघासन कांप उठे
भेदूं बाण दिलों पे कि जनमानस भी जग उठे

हे माँ मुझे वो शक्ति दे कि तेरा कर्ज चूका सकूँ l
तेरी लीला बड़ी अपार है वो फर्ज मैं निभा सकूँ l
देश हित में रहूँ समर्पण जीवन तुझको अर्पण कर सकूँ l
जिसे मानव शक्ति कि पहचान नहीं वो दर्पण उसे दिखा सकूँ l

मैं इस कविता को माँ भारती को समर्पित करता हूँ l
वन्दे मातरम
संतोष यादव






........JAI HIND..........

 कवि, कुछ ऐसी तान सुनाओ,
जिससे उथल-पुथल मच जाए,
एक हिलोर इधर से आए,
एक हिलोर उधर से आए,

प्राणों के लाले पड़ जाएँ,
त्राहि-त्राहि रव नभ में छाए,
नाश और सत्यानाशों का -
धुँआधार जग में छा जाए,

बरसे आग, जलद जल जाएँ,
भस्मसात भूधर हो जाएँ,
पाप-पुण्य सद्सद भावों की,
धूल उड़ उठे दायें-बायें,

नभ का वक्षस्थल फट जाए-
तारे टूक-टूक हो जाएँ
कवि कुछ ऐसी तान सुनाओ,
जिससे उथल-पुथल मच जाए।

माता की छाती का अमृत-
मय पय काल-कूट हो जाए,
आँखों का पानी सूखे,
वे शोणित की घूँटें हो जाएँ,

एक ओर कायरता काँपे,
गतानुगति विगलित हो जाए,
अंधे मूढ़ विचारों की वह
अचल शिला विचलित हो जाए,

और दूसरी ओर कंपा देने
वाला गर्जन उठ धाए,
अंतरिक्ष में एक उसी नाशक
तर्जन की ध्वनि मंडराए,

कवि कुछ ऐसी तान सुनाओ,
जिससे उथल-पुथल मच जाए,

नियम और उपनियमों के ये
बंधक टूक-टूक हो जाएँ,
विश्वंभर की पोषक वीणा
के सब तार मूक हो जाएँ

शांति-दंड टूटे उस महा-
रुद्र का सिंहासन थर्राए
उसकी श्वासोच्छ्वास-दाहिका,
विश्व के प्रांगण में घहराए,

नाश! नाश!! हा महानाश!!! की
प्रलयंकारी आँख खुल जाए,
कवि, कुछ ऐसी तान सुनाओ
जिससे उथल-पुथल मच जाए।

सावधान! मेरी वीणा में,
चिनगारियाँ आन बैठी हैं,
टूटी हैं मिजराबें, अंगुलियाँ
दोनों मेरी ऐंठी हैं।

कंठ रुका है महानाश का
मारक गीत रुद्ध होता है,
आग लगेगी क्षण में, हृत्तल
में अब क्षुब्ध युद्ध होता है,

झाड़ और झंखाड़ दग्ध हैं -
इस ज्वलंत गायन के स्वर से
रुद्ध गीत की क्रुद्ध तान है
निकली मेरे अंतरतर से!

कण-कण में है व्याप्त वही स्वर
रोम-रोम गाता है वह ध्वनि,
वही तान गाती रहती है,
कालकूट फणि की चिंतामणि,

जीवन-ज्योति लुप्त है - अहा!
सुप्त है संरक्षण की घड़ियाँ,
लटक रही हैं प्रतिपल में इस
नाशक संभक्षण की लड़ियाँ।

चकनाचूर करो जग को, गूँजे
ब्रह्मांड नाश के स्वर से,
रुद्ध गीत की क्रुद्ध तान है
निकली मेरे अंतरतर से!

दिल को मसल-मसल मैं मेंहदी
रचता आया हूँ यह देखो,
एक-एक अंगुल परिचालन
में नाशक तांडव को देखो!

विश्वमूर्ति! हट जाओ!! मेरा
भीम प्रहार सहे न सहेगा,
टुकड़े-टुकड़े हो जाओगी,
नाशमात्र अवशेष रहेगा,

आज देख आया हूँ - जीवन
के सब राज़ समझ आया हूँ,
भ्रू-विलास में महानाश के
पोषक सूत्र परख आया हूँ,

जीवन गीत भूला दो - कंठ,
मिला दो मृत्यु गीत के स्वर से
रुद्ध गीत की क्रुद्ध तान है,
निकली मेरे अंतरतर से!

written. by - बालकृष्ण शर्मा 'नवीन'

........JAI HIND..........


 ओ माँ थोड़े दिन सब्र करो अच्छे दिन लेकर आऊँगा !
जो कर्ज दूध का है मुझ पर उसको उतारकर जाऊँगा !!
जो भी तूफाँ आये उसको अपनी छाती सह जाऊँगा !
ओ माँ थोड़े दिन सब्र करो अच्छे दिन लेकर आऊँगा !
.
हैं सवा अरब मेरे भाई, दादा-दादी – ताऊ-ताई !
अरि की मजाल क्या तन छू ले, छू भी न सकेगा परछाईं !
नभमंडल में घन के ऊपर चढ़ मैं दुन्दुभी बजाऊँगा !
ओ माँ थोड़े दिन सब्र करो अच्छे दिन लेकर आऊँगा !
.
कुछ पुत्र तुम्हारे, अहंकार में डूब, मनुजता को भूले !
टुकड़ो में तुझको बाँट रहे, सत्ता मद में फूले-फूले !!
बस कुछ दिन सुख-निद्रा ले लें, उनको भी सबक सिखाऊंगा !
ओ माँ थोड़े दिन सब्र करो अच्छे दिन लेकर आऊँगा !
.
सूखे अधरों पर जीभ फेर, ओ माँ थोड़ा सा हँस दो ना !
उर के उत्तप्त धरातल को थोड़ा सा शीतल कर दो ना !!
बेबस आशंकित नयनों के आंसू मै देख न पाऊँगा !
ओ माँ थोड़े दिन सब्र करो अच्छे दिन लेकर आऊँगा !

"A patriot must always be ready to defendhis country ."
* " देश जले में कुछ ना बोलू में ऐसा गद्दार नहीं "*



........JAI HIND..........
........JAI HIND..........

Tuesday, May 22, 2012



ऐ पाकिस्तान कान खोलकर सुन ले
अबकी जंग छिड़ी तो, नाम निशान नहीं होगा
कश्मीर तो होगा , पर पकिस्तान नहीं होगा
लाल कर दिया तुने , श्री नगर की घटी को
किस गफलत में जगा रहे हो सोई हल्दीघाटी को
ज़हर पिलाकर मजहब का इन कश्मीरी परवानो को
भय और लालच दिखलाकर तुम भेज रहे नादानों को
खुले प्रशिक्षद खुले शस्त्र है,खुली हुई शैतानी है
सारी दुनिया जान गई है हरकत पाकिस्तानी है
बहुत हो चुकी मक्कारी बहुत हो चूका हस्तक्षेप
समझा दो उनको वरना भभक उठेगा सारा देश
देश अगर यदि खड़ा हो गया तो त्राहि -त्राहि मच जाएगी
पाकिस्तान के हर कोने में महाप्रलय आजाएगी
क्या होगा अनजान तुम्हे इसका अनुमान नहीं होगा
कश्मीर तो होगा पर पाकिस्तान नहीं होगा
ए कायर इस एटम पर हिम्मत कौन दिखलायेगा
इसे चलाने के लिए क्या बाप तुम्हारा आएगा
अबकी चिंता मतकर चेहरे का खोल बदल देंगे
इतिहास की क्या है हस्ती सारा भूगोल बदल देंगे
धरा हर मोड़ बदलकर लाहौर से गुजरेगी गंगा
इस्लामाबाद की छाती पर लहराएगा भारत का झंडा
रावलपिंडी और कराची तक सबकुछ गारथ हो जायेगा
सिन्धु नदी के आर - पार पूरा भारत हो जायेगा
फिर सदियों - सदियों तक जिन्ना जैसा शैतान नहीं होगा
कश्मीर तो होगा लेकिन पाकिस्तान नहीं होगा



........JAI HIND..........

Monday, May 21, 2012




सवाल आप हैं गर तो जवाब हम भी हैं
हैं ईंट आप तो पत्थर जनाब हम भी हैं

शरीफ़ हम हैं शरीफ़ों के वास्ते साहिब
जो हो खराब कोई तो खराब हम भी हैं



........JAI HIND..........


स्वतंत्रता दिवस पर उठते सवाल

देश में हड़तालें हैं,
चक्का जाम हैं,
सड़कें बंद हैं,
रेल बंद है,
बसें फूँकी जाती हैं..
टायर जलायें जाते हैं
पुतले फूँके जाते हैं
सबसे बड़ा लोकतंत्र है...
ये देश स्वतंत्र है..

स्कूल में गोली चलती है
बच्चे आत्महत्या करते हैं
एम.एम.एस बनते हैं,
ये देश के भविष्य हैं(?)
स्कूल कालेज की
दुकान लगती है,
सरेआम विद्या बिकती है
सबसे बड़ा लोकतंत्र है...
ये देश स्वतंत्र है...

कानून तोड़े जाते हैं
दुकानें जलाई जाती हैं
दंगे-फसाद आम हैं
आतंकवाद है,
हर राज्य में वाद-विवाद है
६१ सालों का आरक्षण खास है
सब निकालते भडास हैं
सबसे बड़ा लोकतंत्र है...
ये देश स्वतंत्र है...

इज्जत पर परमाणु करार है
नोटों पर बनती सरकार है
आतंकवादियों पर रूख नरम है
देश तोड़ना भाषा का करम है
राज ठाकरे का ’राज’ है
ये नेताओं के हाल हैं
ये कैसा तंत्र है (?)
’नोट’ या ’वोट’ तंत्र है
सबसे बड़ा लोकतंत्र है...
ये देश स्वतंत्र है...

३० प्रतिशत अशिक्षित हैं
खाना खिलाने वाला किसान
मजबूर है
बिना छत के मजदूर हैं
पीने को पानी नहीं
नदियों के पानी पर लडाई है
एकता की होती बड़ाई है
६१ सालों में बुराइयाँ
जस की तस हैं
ढीठ देश आज भी
बेबस है,
कमजोर है
जाने देश किस ओर है
सबसे बड़ा लोकतंत्र है!!!
ये देश स्वतंत्र है???




........JAI HIND..........


मेरे देशवाशियों
जब कभी आप खुलकर हंसोंगे ,
तो मेरे परिवार को याद कर लेना ...
जो अब कभी नही हँसेंगे...

जब आप शाम को अपने
घर लौटें ,और अपने अपनों को
इन्तजार करते हुए देखे,
तो मेरे परिवार को याद कर लेना ...
जो अब कभी भी मेरा इन्तजार नही करेंगे..

जब आप अपने घर के साथ खाना खाएं
तो मेरे परिवार को याद कर लेना ...
जो अब कभी भी मेरे साथ खा नही पायेंगे.

जब आप अपने बच्चो के साथ खेले ,
तो मेरे परिवार को याद कर लेना ...
मेरे बच्चों को अब कभी भी मेरी गोद नही मिल पाएंगी !!

जब आप सकून से सोयें
तो मेरे परिवार को याद कर लेना ...
वो अब भी मेरे लिए जागते है ...!!

मेरे देशवाशियों ;
शहीद हूँ मैं ,
मुझे भी कभी याद कर लेना ..
आपका परिवार आज जिंदा है ;
क्योंकि ,
नही हूँ...आज मैं !!!!!
शहीद हूँ मैं …………॥!!!!




........JAI HIND..........


जा चुके है सब और वही खामोशी छायी है,
पसरा है हर ओर सन्नाटा, तन्हाई मुस्कुराई है,
छूट चुकी है रेल ,
चंद लम्हों की तो बात थी,
क्या रौनक थी यहॉं,
जैसे सजी कोई महफिल खास थी,
अजनबी थे चेहरे सारे,
फिर भी उनसे मुलाक़ात थी,
भेजी थी किसी ने अपनाइयत,
सलाम मे वो क्या बात थी,
एक पल थे आप जैसे क़ौसर,
अब बची अकेली रात थी,
चलो अब लौट चलें यहॉं से,
छूट चुकी है रेल
ये अब गुज़री बात थी,
उङते काग़ज़, करते बयान्‍,
इनकी भी किसी से
दो पल पहले मुलाक़ात थी,
बढ़ चले क़दम,
कनारे उन पटरियों
कहानी जिनके रोज़ ये साथ थी,
फिर आएगी दूजी रेल,
फिर चीरेगी ये सन्नाटा
जैसे जिन्दगी से फिर मुलाक़ात थी,
फिर लौटेंगे और,
भारी क़दमों से,जैसे
कोई गहरी सी बात थी,
छूट चुकी है रेल,
अब सिर्फ काली स्याहा रात थी |

........JAI HIND..........

Sunday, May 20, 2012



सोचता हूँ क्या दे पाउँगा जो मैंने पाया है इस देश से.
क्या मैं कभी चुका पाउँगा जो मैंने पाया है इस देश से ||.
फेलाना है मुझे देश सम्मान की भावना.
शायद इस तरह नज़र मिला पाऊं इस देश से ||.

खोया है हर नागरीक जाने किस होड़ मैं.
दिलाना है याद उसे इस देश की ||.
मौका है गडतंत्र दिवस.
मिल के सुंदरता बढ़ाना है इस देश की ||.


........JAI HIND..........
 
We Are Not Human Beings
Having a Spiritual Experience.
We Are Spiritual Beings
Having a Human Experience.

........JAI HIND..........

 Waves are always our Inspiration, 
not because they look beautiful 
but because whenever they go down 
they come up with a greater speed.

........JAI HIND..........


 !! सुलझता फितूर.........@


आसमां का बरसना अभी बाक़ी है...
ज़मीं का उगना बाक़ी है...

बाक़ी है कहानी में कहानी की कहानी...
बात की बात करनी बाक़ी है...

क्या-क्या गुज़र चुका है अब तलक़....
क़तार में खड़ा बाक़ी अभी बाक़ी है...

वक़्त के कठघरे में वक़्त की पेशी बाक़ी है ...
और ख़त्म होने से पहले

अंजाम भी अपना अंजाम देखना चाहता है...
ये ख्वाहिशों की ख्वाहिशें कभी पूरी हो सकेंगी...

या रह जाएगी बाक़ी दास्तां हर कहानी की...


........JAI HIND..........

 !......गाँवों का रोना, दिल्ली को गाना लगता है.....!


चिड़िया की जाँ लेने में इक दाना लगता है
पालन कर के देखो एक जमाना लगता है ॥१॥

अंधों की सरकार बनी तो उनका राजा भी
आँखों वाला होकर सबको काना लगता है ॥२॥

जय-जय के नारों ने अब तक कर्म किये ऐसे
हर जयकारा अब ईश्वर पर ताना लगता है ॥३॥

कुछ भी पूछो, इक सा बतलाते सब नाम-पता
तेरा कूचा मुझको पागलखाना लगता है ॥४॥

दूर बजें जो ढोल सभी को लगते हैं अच्छे
गाँवों का रोना, दिल्ली को गाना लगता है ॥५॥

कल तक झोपड़ियों के दीप बुझाने का मुजरिम
सत्ता पाने पर, अब वो परवाना लगता है ॥६॥

टूटेंगें विश्वास, कली से मत पूछो कैसा
यौवन देवों को देकर मुरझाना लगता है ॥७॥

जाँच समितियों से करवाकर कुछ ना पाओगे
उसके घर में शाम-सबेरे थाना लगता है॥८॥

(हमारे नेताओं की लीलाओं को समर्पित ....



........JAI HIND..........




 तुम को देखा जैसे दरपन देख रहा हूँ .
कहीं छिपा तुम में अपना मन देख रहा हूँ.
नैन नासिका अधर कर्ण सुंदर सी ग्रीवा ,
एक सपन का भूमि अवतरन देख रहा हूँ.
कविता का सौन्दर्य तुम्ही से आया मुझ में,
फिर बरसे यह बादल, गर्जन देख रहा हूँ.
सूत्रपात हो तुम मधुरिम साहित्य निधि का,
रूप तुम्हारे में अनुपम धन देख रहा हूँ.
चाहूँ- प्यार करूँ -दिल में रखूं या गाऊं,
क्यूँ है तुम से यह आकर्षण देख रहा हूँ.
मधुर तुम्हारे सपने नैन चुराते आते ,
खुली आँख से वह आलिंगन देख रहा हूँ.

जय माँ भारती



........JAI HIND..........

Saturday, May 19, 2012


होंसले हो जिनके बुलंद वो बुलंदी पर रहेते हैं ,
जीत उन्ही को मिलती है जो हारना जानते हैं ,
कायर तो रास्ते से ही भटक जाते हैं ,
जिगर वाले ही मंजिल को पाते हैं ,
इंसान हो तो इंसानियत को मत भूलना,
भर पेट खाना तो जानवर भी खातें हैं


........JAI HIND..........

 "देश हे पुकारता,पुकारती हे माँ भारती

रक्त से तिलक करो गोलियों से आरती
........JAI HIND..........


चाँद, सूरज-सा तिरंगा
प्रेम की गंगा तिरंगा
विश्व में न्यारा तिरंगा
जान से प्यारा तिरंगा
सारे हिंदुस्तान की
बलिदान-गाथा गाएगा
ये तिरंगा आसमाँ पर
शान से लहराएगा।
जय जय वीर जवान,,,जय जय हिन्दुस्थान,,

........JAI HIND..........
 आंधियां चाहें उठाओ,
बिजलियां चाहें गिराओ,
जल गया है दीप तो अंधियार ढल कर ही रहेगा।

रोशनी पूंजी नहीं है, जो तिजोरी में समाये,
वह खिलौना भी न, जिसका दाम हर गाहक लगाये,
वह पसीने की हंसी है, वह शहीदों की उमर है,
जो नया सूरज उगाये जब तड़पकर तिलमिलाये,
उग रही लौ को न टोको,
ज्योति के रथ को न रोको,
यह सुबह का दूत हर तम को निगलकर ही रहेगा।
जल गया है दीप तो अंधियार ढल कर ही रहेगा।

दीप कैसा हो, कहीं हो, सूर्य का अवतार है वह,
धूप में कुछ भी न, तम में किन्तु पहरेदार है वह,
दूर से तो एक ही बस फूंक का वह है तमाशा,
देह से छू जाय तो फिर विप्लवी अंगार है वह,
व्यर्थ है दीवार गढना,
लाख लाख किवाड़ जड़ना,
मृतिका के हांथ में अमरित मचलकर ही रहेगा।
जल गया है दीप तो अंधियार ढल कर ही रहेगा।

है जवानी तो हवा हर एक घूंघट खोलती है,
टोक दो तो आंधियों की बोलियों में बोलती है,
वह नहीं कानून जाने, वह नहीं प्रतिबन्ध माने,
वह पहाड़ों पर बदलियों सी उछलती डोलती है,
जाल चांदी का लपेटो,
खून का सौदा समेटो,
आदमी हर कैद से बाहर निकलकर ही रहेगा।
जल गया है दीप तो अंधियार ढल कर ही रहेगा।

वक्त को जिसने नहीं समझा उसे मिटना पड़ा है,
बच गया तलवार से तो फूल से कटना पड़ा है,
क्यों न कितनी ही बड़ी हो, क्यों न कितनी ही कठिन हो,
हर नदी की राह से चट्टान को हटना पड़ा है,
उस सुबह से सन्धि कर लो,
हर किरन की मांग भर लो,
है जगा इन्सान तो मौसम बदलकर ही रहेगा।
जल गया है दीप तो अंधियार ढल कर ही रहेगा।
 


VANDEMATRAM

........JAI HIND..........

Friday, May 18, 2012



 अगर दुश्मन करे आग़ाज़, हम अंजाम लिख देंगे...!,
लहू के रंग से इतिहास में संग्राम लिख देंगे......!!

हमारी ज़िंदगी पर तो वतन का नाम लिखा है....!
अब अपनी मौत भी अपने वतन के नाम लिख देंगे...!!


........JAI HIND..........

Hame Chalte hi Rehna hai.


जो साथ चलेंगे उनको साथ लेकर चलेंगे ,
जो नहीं चलेंगे उनको छोड़कर चलेंगे ,
जो बाधा बनकर सामने आयेंगे
उन्हें ठोकर मारकर चलेंगे ,
चलना ही हमारी नियति है ,,, हम चलेंगे ,
हम चलेंगे तो ही राष्ट्र चलेगा -
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Thursday, May 17, 2012

desh prem


हैं लिए हथियार दुश्मन ताक में बैठा उधर
और हम तैयार हैं सीना लिए अपना इधर
खून से खेलेंगे होली गर वतन मुश्किल में हैं
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में हैं

हाथ, जीन में हो जूनून, कटते नहीं तलवार से
सर जो उठ जातें हैं वह झूकते नहीं ललकार से
और भडकेगा जो शोला-सा हमारे दिल में हैं
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में हैं

हम तो घर से निकले ही थे बांधकर सर पे कफन
चाहतें ली भर, लिए लो भर चले हैं ये कदम
जिंदगी तो अपनी मेहमान, मौत की महफिल में हैं
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में हैं

दिल में तूफानों की टोली और नसों में इन्किलाब
होश दुश्मन के उडा देंगे हमें रोको ना
दूर रह पायें जो हम से दम कहां मंझिल में हैं
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में हैं
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जुल्म, भूख और बेरहमी कभी

इस जहां से खत्म नहीं हो सकती।

उनसे लड़ने के नारे सुनना अच्छा लगता है

गरीबी बुरी, पर महफिल में खूब फबती।
हैं लिए हथियार दुश्मन ताक में बैठा उधर
और हम तैयार हैं सीना लिए अपना इधर
खून से खेलेंगे होली गर वतन मुश्किल में हैं
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में हैं


हाथ, जीन में हो जूनून, कटते नहीं तलवार से
सर जो उठ जातें हैं वह झूकते नहीं ललकार से
और भडकेगा जो शोला-सा हमारे दिल में हैं
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में हैं

हम तो घर से निकले ही थे बांधकर सर पे कफन
चाहतें ली भर, लिए लो भर चले हैं ये कदम
जिंदगी तो अपनी मेहमान, मौत की महफिल में हैं
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में हैं

दिल में तूफानों की टोली और नसों में इन्किलाब
होश दुश्मन के उडा देंगे हमें रोको ना
दूर रह पायें जो हम से दम कहां मंझिल में हैं
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में हैं

Maa aap ko shat shat naman.

कब्र के आगोश में जब थक के सो जाती है माँ,
तब कहीं जा कर, ज़रा थोड़ा सुकूँ पाती है माँ।
फिक्र में बच्चों की कुछ ऐसी घुल जाती है माँ,
नौजवाँ हो कर के भी, बूढ़ी नज़र आती है माँ।
रूह के रिश्तों की ये गहराइयाँ तो देखिये,
चोट लगती है हमारे और चिल्लाती है माँ।
कब ज़रूरत हो मेरी बच्चों को इतना सोच कर,
जागती रहती हैं आँखें और सो जात है माँ।
चाहे हम खुशियों में माँ को भूल जायें दोस्तों,
जब मुसीबत सर पे आ जाए, तो याद आती है माँ।
लौट कर सफर से वापस जब कभी आते हैं हम,
डाल कर बाहें गले में सर को सहलाती है माँ।
हो नही सकता कभी एहसान है उसका अदा,
मरते मरते भी दुआ जीने की दे जाती है माँ।
मरते दम बच्चा अगर आ पाये न परदेस से,
अपनी दोनो पुतलियाँ चौखट पे धर जाती है माँ।
प्यार कहते है किसे और ममता क्या चीज है,
ये तो उन बच्चों से पूँछो, जिनकी मर जाती है माँ।
One must disown a person to save a family. 
One family can be sacrificed to save village.
A village has to be abandoned to save a state. 
But if one needs to save his soul, 
he must abandon the entire world.

There are three kinds of fools in the world 

one who has lot of desires in spite of being penniless,

 one who gets into fights (quarrels) in spite of being poor (and hence at a disadvantage), 

one who gets into a debate without having enough knowledge about the subject matter.





जिनको भी मेरे भारत की धरती से प्यार नहीं होगा
उनको भारत में रहने का कोई अधिकार नहीं होगा
धरती से अम्बर से कहना, हर ताल समंदर से कहना
कहना कारगिल की घाटी से, गोहाटी से चौपाटी से
ख़ूनी परिपाटी से कहना, दुश्मन की माटी से कहना
कहना लोभी, मक्कारों से जासूसी करने वालों से
जो मेरा आँगन तोड़ेगी वो बाँह तोड़ दी जाएगी
जो आँख उठेगी भारत पर वो आँख फोड़ दी जाएगी
सैंतालिस का बंटवारा भी कोई अंधा रोष रहा होगा
जिन्ना की भूख रही होगी, गाँधी का दोष रहा होगा
जो भूल हुई हमसे पहले, वो भूल नहीं होने देंगे
हम एक इंच धरती भारत से अलग नहीं होने देंगे
जो सीमा पार पड़ोसी है
उसको तो क्या समझाना है
वो बंटवारे का रोगी है उसका ये रोग पुराना है
लेकिन रावलपिंडी पहलेअपने दामन में तो झाँके
अपने घर का आलम देखे मेरे आँगन में ना ताके
भारत में दखलंदाजी की तो पछताना पड़ जायेगा
रावलपिंडी, लाहौर, कराची तक भारत कहलायेगा

I don’t want to be,
A wealthy man,
Nor I want to be,
A working man.

I want to be,
A great soldier,
Fighting on the front,
with a gun on my shoulder,

I want to die for,
My great, beloved nation,
And for my enemy,
I shall have no compassion,

I want to let the
Chinese know
That Indians can die,
For their Motherland.
 
 
 
 
 Gen V.K. Singh as a Std VIII student, culled from his school magazine
 
 
 



 चीनी सालों होश में आओ वर्ना होश में ला देंगे
तेरी माँ की माँ को भी हम नानी याद दिला देंगे
गया ज़माना बात-बात पर हमको आँख दिखाते थे
और हिन्दुस्तानी हम सीधे सादे चुपचाप रह जाते थे
अब तो आँख दिखा के देखो सीधे आँख फोड़ देंगे
अग्नि पृथ्वी सारी मिसाइलें बीजिंग तक घुसेड देंगे
छोडो अरुणांचल-सिक्किम पर घडी-घडी दावा करना
जब देखो अपने धन-बल का रोज़ - रोज़ हौवा करना
अच्छा होगा इज्ज़त से हिमालय के उस पार ही रहना
अच्छा होगा अपनी छोटी सी चार फुटी औकात में रहना
वर्ना यहीं से बैठे - बैठे हम खोपड़ी तुम्हारी खोल देंगे
तुम चीनियों को हम शरबत जैसा पानी में घोल देंगे
इतराते हो जिस दीवार पे मिनटों में ध्वस्त हो जायेगी
हिरोशिमा-नागासाकी से भी भयानक तबाही हो जायेगी
पूरी दुनिया में अब भारत की शान का परचम लहराता है
बाप तुम्हारा अमरीका भी अब यहाँ आके दम हिलाता है
ताकतवर होने पर भी हम छोटे देशों को नहीं डराते हैं
शांतिप्रियता और भाईचारे के लिए हम "चर्चित" कहलाते हैं



Jai Jai Bharat Mata
कोई कह दे कब काशी ने काबा की दीवारें तोड़ी,
हमने कब मक्का में जाकर मस्जिद या मीनारें तोड़ी !   तुम खूब पढो कुराने किन्तु हमको भी वेद पढ़ाने दो,
चन्दा से बैर नहीं लेकिन सूरज को अर्ध्य चढाने दो !!
पर अपनी धर्मसुरक्षा में सूरज की आग नहा लेंगें,
गंगा को पड़ी जरूरत यदि शोणित की नदी बहा देंगे !!
हम सागर हैं पर मत भूलो बलबावन बनकर तपते हैं,
बर्फीली परतों में भी लपटों वाले वंश पनपते हैं !!
तो साफ़ बता दूं अब हिंसक हर लहर मोड़ दी जाएगी,
क्रान्तिग्रंथ में एक कहानी और जोड़ दी जाएगी !!
जो उपवन पर घात करे वो शाख तोड़ दी जाएगी,
जन्मभूमि पर उठी हुई हर आँख फोड़ दी जाएगी !!.

 Jindagi ne kae sawalat badal daale, 
wakt ne mere halaat badal daale,
jo hum kal the wahi ham aaj bhi hai, 
bas mere liye logo ne apne khayalat badal daale..



 Bharat Mata Ki Jai

Wednesday, May 16, 2012


विकास दर इतनी ऊंची हो गयी है
कि नैतिकता कहीं भीड़ में खो गयी है।
आदर्श की बात करना मजाक लगता है
राहजनी की वारदात का इल्जाम
रहबरों के सिर पर डलता है,
माली से उज़ाड़ दिया बाग
शिकायत करना बेकार है,
शैतानियत बन गयी है फैशन
शैतानों के बाहर खड़ा पहरेदार है,
ज़माना काबू है उन लोगों के हाथ में
जिनकी ईमानदारी खो गयी है,
कौन जगायेगा अलख, भीड़ जो सो गयी है

श्री नरेन्द्र मोदी ,बाबा रामदेवजी ,सुब्रमनियम स्वामी.


जो पत्थर हथोडी की चोट नहीं खाता
जो पत्थर हथोडी की चोट नहीं खाता
वो न तो मंदिर में न किसी मस्जिद में जगह कभी पाता
मुश्किलें तो जिंदगी कि तस्वीर का अनोखा रंग हैं
बिना इस रंग को पाए अगर जीत भी गए तो भी जीत की तस्वीर में मज़ा नहीं आता.

जो पानी उपर से नीचे नहीं आता
वो न तो किसी की लिए अमृत होता न ज़हर बन पाता
गिरना तो जिंदगी का एक कदम हैं
बिना इस कदम को रखे आकाश छूने का मज़ा भी नहीं आता

जय हिंद ... वन्देमातरम .....
वह खून कहो किस मतलब का, जिसमें उबाल का नाम नहीं।
वह खून कहो किस मतलब का, आ सके देश के काम नहीं।

वह खून कहो किस मतलब का, जिसमें जीवन, न रवानी है!

जो परवश होकर बहता है, वह खून नहीं, पानी है!

 
उस दिन लोगों ने सही-सही, खून की कीमत पहचानी थी।
जिस दिन सुभाष ने बर्मा में, मॉंगी उनसे कुरबानी थी।

बोले, "स्वतंत्रता की खातिर, बलिदान तुम्हें करना होगा।

तुम बहुत जी चुके जग में, लेकिन आगे मरना होगा।

आज़ादी के चरणें में जो, जयमाल चढ़ाई जाएगी।

वह सुनो, तुम्हारे शीशों के, फूलों से गूँथी जाएगी।

आजादी का संग्राम कहीं, पैसे पर खेला जाता है?

यह शीश कटाने का सौदा, नंगे सर झेला जाता है"


यूँ कहते-कहते वक्ता की, आंखों में खून उतर आया!
मुख रक्त-वर्ण हो दमक उठा, दमकी उनकी रक्तिम काया!

आजानु-बाहु ऊँची करके, वे बोले, "रक्त मुझे देना।

इसके बदले भारत की, आज़ादी तुम मुझसे लेना।"

हो गई सभा में उथल-पुथल, सीने में दिल न समाते थे।

स्वर इनकलाब के नारों के, कोसों तक छाए जाते थे।

“हम देंगे-देंगे खून” , शब्द बस यही सुनाई देते थे।

रण में जाने को युवक खड़े, तैयार दिखाई देते थे।

बोले सुभाष, "इस तरह नहीं, बातों से मतलब सरता है।

लो, यह कागज़, है कौन यहॉं, आकर हस्ताक्षर करता है?

इसको भरनेवाले जन को, सर्वस्व-समर्पण काना है।

अपना तन-मन-धन-जन-जीवन, माता को अर्पण करना है।


पर यह साधारण पत्र नहीं, आज़ादी का परवाना है।
इस पर तुमको अपने तन का, कुछ उज्जवल रक्त गिराना है!

वह आगे आए जिसके तन में, खून भारतीय बहता हो।
वह आगे आए जो अपने को, हिंदुस्तानी कहता हो!

वह आगे आए, जो इस पर, खूनी हस्ताक्षर करता हो!
मैं कफ़न बढ़ाता हूँ, आए, जो इसको हँसकर लेता हो!"

सारी जनता हुंकार उठी-, हम आते हैं, हम आते हैं!
माता के चरणों में यह लो, हम अपना रक्त चढाते हैं!

साहस से बढ़े युबक उस दिन, देखा, बढ़ते ही आते थे!
चाकू-छुरी कटारियों से, वे अपना रक्त गिराते थे!

फिर उस रक्त की स्याही में, वे अपनी कलम डुबाते थे!
आज़ादी के परवाने पर, हस्ताक्षर करते जाते थे!

उस दिन तारों ने देखा था, हिंदुस्तानी विश्वास नया।
जब लिक्खा महा रणवीरों ने, ख़ूँ से अपना इतिहास नया।

जय हिंद .... वन्देमातरम .....
जन - जन में जलने लगे , अंगारे देख तेरी बर्बादी का ,
लड़ने को तैयार हो गए , हम जंग दूसरी आजादी का ,
न कमी थी न है आज भी ,तैयार है जान- ऐ -वतन के लिए ,
अब जो लहराया न झुकने देंगे , हम तिरंगा नयी आजादी का ,
खड़ा दुश्मन सामने फ़ौज लिए , लिए हाथ में शास्त्र मक्कारी का ,
मिलेगा जवाब जरूर उसको भी , देता साथ प्रभु सच्चाई का ,
एक तो वो दाग बुरा , फिरंगियों की गुलामी का ,
इस पर वो क़र्ज़ सर पर , शहीदों की जवानी का ,
अब जब आया समय पलटकर , रंग रूप लिए अपनों का ,
किसे पता था घर का ही चिराग, जलाएगा घर अपनों का,
उठो  जागो  चलो  कर्म शस्त्र धारण करो ,अब वक़्त नहीं है सोने का
लड़ने को तैयार हो गए , हम जंग दूसरी आजादी का
भारत माता की जय
संतोष यादव, संदीप कपीला