कभी अपनी खुशियों को तो कभी खुद को भुला देती थी |
मैं जब रोता था तो माँ मुझे सीने से लगा लोरी सुना देती थी ||
हाथो में छाले और आँखों में चूल्हे का धुआ रहता था |
खुद को भूखा रख कर माँ मुझे भर पेट रोटी खिला देती थी ||
आज मखमल के गद्दों पर बेचैनी से राते कटती है |
कभी माँ अपनी गोद में मेरा सर रख मुझे सुला देती थी ||
रो पड़ता हूँ आज भी बच्चो सा ना जाने क्यों मैं " मानव " |
आज भी माँ मुझे उतनी ही मासूमियत से गले लगा लेती है ||
उसके त्यागों के आगे हिमालय भी मुझे छोटा दिखता है |
उसके चरणों में ही मुझे अपनी जन्नत दिखाई देती है ||
उसका कर्ज जीते जी तो मैं चूका नहीं सकता " मानव "
और वो हर क्षण बस मेरी लम्बी आयु की ही आशीषे देती है ||
मिटा दूँ अगर खुद को तो भी उसको भुला ना पाऊंगा |
वो माँ है,वो मेरी माँ है वो मेरे दिल में, मेरी रगों में बसती है ||
मैं जब रोता था तो माँ मुझे सीने से लगा लोरी सुना देती थी ||
हाथो में छाले और आँखों में चूल्हे का धुआ रहता था |
खुद को भूखा रख कर माँ मुझे भर पेट रोटी खिला देती थी ||
आज मखमल के गद्दों पर बेचैनी से राते कटती है |
कभी माँ अपनी गोद में मेरा सर रख मुझे सुला देती थी ||
रो पड़ता हूँ आज भी बच्चो सा ना जाने क्यों मैं " मानव " |
आज भी माँ मुझे उतनी ही मासूमियत से गले लगा लेती है ||
उसके त्यागों के आगे हिमालय भी मुझे छोटा दिखता है |
उसके चरणों में ही मुझे अपनी जन्नत दिखाई देती है ||
उसका कर्ज जीते जी तो मैं चूका नहीं सकता " मानव "
और वो हर क्षण बस मेरी लम्बी आयु की ही आशीषे देती है ||
मिटा दूँ अगर खुद को तो भी उसको भुला ना पाऊंगा |
वो माँ है,वो मेरी माँ है वो मेरे दिल में, मेरी रगों में बसती है ||

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